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धरमजयगढ़ में कच्ची लाल ईंटों का अवैध निर्माण जोरो पर, प्रशासन की चुप्पी।

धर्मजयगढ तहसील और आसपास की ग्राम पंचायतों में इन दिनों कच्ची लाल ईंटों का निर्माण नहीं, बल्कि कानून की खुलेआम अवहेलना हो रही है। बरसात खत्म होते ही ईंट भट्टों से उठता धुआं यह बताने के लिए काफी है कि यहां न अनुमति की परवाह है, न नियमों का डर। खनिज विभाग रायगढ़ की अनुमति के बिना ईंटें बन रही हैं, पक रही हैं और बाजार तक पहुंच भी रही हैं—वह भी सालों से।नियम साफ हैं। किसान निजी जरूरत के लिए अधिकतम 50 हजार ईंटें, वह भी अनुमति लेकर बना सकता है। लेकिन धर्मजयगढ़ क्षेत्र में कुछ “चिन्हित” कारोबारी हर सीजन 10 से 20 लाख ईंटें बनाकर 3 से 4 रुपये प्रति ईंट के हिसाब से बेच रहे हैं। सवाल सीधा है—

इतनी बड़ी मात्रा में ईंट निर्माण किसकी आंखों के सामने और किसके संरक्षण में हो रहा है?

ईंटों को पकाने में इस्तेमाल हो रहा कोयला इस पूरे खेल का सबसे काला सच है। कागजों में एक-दो गाड़ी कोयले की रॉयल्टी कटवाकर पर्ची रख ली जाती है, जबकि असलियत में बाकी कोयला एसईसीएल की अधिग्रहीत भूमि से अवैध रूप से निकाला जाता है। फरवरी 2016 में जब एसईसीएल को इस भूमि पर पूर्ण अधिकार मिल चुके हैं, तब वहां से कोयला चोरी होना सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति की लूट है।

इस अवैध कारोबार का दुष्परिणाम केवल राजस्व नुकसान तक सीमित नहीं है। माफिया किसानों को भड़काकर एसईसीएल की वैधानिक परियोजनाओं के खिलाफ खड़ा करता है, नतीजा यह कि विकास योजनाएं एक दशक पीछे धकेल दी जाती हैं। वहीं, कोयला निकालने वाले मजदूर जान जोखिम में डालकर केवल पेट भरने लायक कमाते हैं, जबकि ईंट माफिया पूरे सीजन में 20 से 30 लाख रुपये की मोटी कमाई कर लेता है।

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि वन विभाग और राजस्व अमला सब जानता है। पटवारी से लेकर मैदानी कर्मचारियों तक को वर्षों से इस अवैध ईंट निर्माण और ‘दूसरे नंबर’ के कोयले की जानकारी है, फिर भी कार्रवाई शून्य है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि संदेह के घेरे में आने लायक चुप्पी है।बंगला ईंट से निर्माण शासन के अलावा अवैधानिक है और इसके लिए अनुमति अनिवार्य है—यह बात किताबों में नहीं, कानून में लिखी है। इसके बावजूद धर्मजयगढ़ में सालों से वही चेहरे, वही भट्टे और वही अवैध कारोबार चल रहा है।अब सवाल यह नहीं है कि जांच होगी या नहीं।

सवाल यह है कि कब तक होगी और किस पर होगी?

यदि अब भी शासन और विभाग मौन रहे, तो यह साफ माना जाएगा कि धर्मजयगढ़ में ईंट और कोयले का यह काला कारोबार कानून की कमजोरी से नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण से फल-फूल रहा है।

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